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इस समय प्रभासाक्षी के व्यंग्य चित्रकार ‘काक‘ (पूरा नाम हरिश्चंद्र शुक्ला ‘काक‘), पिछले चालीस साल से हिंदी के प्रमुख अखबारों के साथ जुड़े रहे हैं और इस दौरान उन्होंने राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्रों पर अपनी तीखी, भदेस टिप्पणियों से कार्टून विधा के क्षेत्र में अपनी अलग जगह बनायी है।
अमेजॉन के ‘किंडल स्टोर‘ पर उपलब्ध उनके कार्टून न सिर्फ अपनी तीखी और चुटीली टिप्पणियों के जरिए पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि भारतीय राजनीति तथा समाज की महत्वपूर्ण घटनाओं का डॉक्यूमेंटेशन भी करते हैं।
‘काक‘ की तरफ से पेश ई-बुक्स फिलहाल चार खंडों में उपलब्ध हैं। इन्हें उनके पुत्र तुषित शुक्ला ने संपादित कर पेश किया है। इन ई-बुक्स में ‘काक‘ के कार्टूनों के अंग्रेजी अनुवाद भी पढ़े जा सकते हैं ताकि अहिंदी भाषी पाठक भी उनका आनंद ले सकें।
‘काक‘ के कार्टूनों की खास बात है उनकी बेलाग टिप्पणियां, जो देसी भाषा और जमीनी अनुभवों से जुड़ी है। उनके पात्र समाज के पीड़ित, शोषित तबकों के लोग हैं और जब वे अपने आसपास की राजनैतिक-सामाजिक विषमताओं पर टिप्पणियां करते हैं तो उनका आक्रोश अनायास ही पाठक के मन को छू लेता है। जीवन के सातवें दशक में भी वे जिस तरह आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बिठाने में सफल रहे हैं, उसमें हिंदी के अन्य रचनाकर्मियों के लिए प्रेरणा सन्देश छिपा हुआ है।
‘काक‘ की लिखी ई-बुक्स यहां पर उपलब्ध हैं।
लिंक: http://www.amazon.com ( search books- kaaktoons series )
प्रस्तुति: कार्टूनिस्ट चन्दर
अमेजॉन के ‘किंडल स्टोर‘ पर उपलब्ध उनके कार्टून न सिर्फ अपनी तीखी और चुटीली टिप्पणियों के जरिए पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि भारतीय राजनीति तथा समाज की महत्वपूर्ण घटनाओं का डॉक्यूमेंटेशन भी करते हैं।
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‘काक‘ के कार्टूनों की खास बात है उनकी बेलाग टिप्पणियां, जो देसी भाषा और जमीनी अनुभवों से जुड़ी है। उनके पात्र समाज के पीड़ित, शोषित तबकों के लोग हैं और जब वे अपने आसपास की राजनैतिक-सामाजिक विषमताओं पर टिप्पणियां करते हैं तो उनका आक्रोश अनायास ही पाठक के मन को छू लेता है। जीवन के सातवें दशक में भी वे जिस तरह आधुनिक तकनीक के साथ तालमेल बिठाने में सफल रहे हैं, उसमें हिंदी के अन्य रचनाकर्मियों के लिए प्रेरणा सन्देश छिपा हुआ है।
‘काक‘ की लिखी ई-बुक्स यहां पर उपलब्ध हैं।
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प्रस्तुति: कार्टूनिस्ट चन्दर
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